भारत में बैंकिंग सुधार से जुड़ी प्रमुख समितियाँ
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🏦 भारत में बैंकिंग सुधार से जुड़ी प्रमुख समितियाँ
भारत में बैंकिंग क्षेत्र के सुधारों की नींव विभिन्न विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों पर टिकी है। यहाँ UGC NET परीक्षा के दृष्टिकोण से सभी महत्वपूर्ण समितियों का विवरण दिया जा रहा है।
1. नरसिम्हम समिति – I (1991)
पृष्ठभूमि
- गठन वर्ष: 1991
- अध्यक्ष: एम. नरसिम्हम (M. Narasimham), पूर्व RBI गवर्नर
- अन्य नाम: Committee on the Financial System (CFS)
- उद्देश्य: वित्तीय क्षेत्र (बैंकिंग + पूंजी बाजार) की संरचना, संगठन, कार्यप्रणाली की समीक्षा
प्रमुख सिफारिशें
- SLR और CRR में कमी: CRR घटाकर 10% और SLR घटाकर 25% करने की सिफारिश
- ब्याज दर विनियमन (Deregulation): बैंकों को अपने ग्राहकों के लिए ब्याज दरें स्वयं निर्धारित करने की स्वतंत्रता
- प्राथमिकता क्षेत्र ऋण: कुल ऋण का कम से कम 10% हाशिये के किसानों, छोटे व्यवसायों, कुटीर उद्योगों को दिया जाए
- पूंजी पर्याप्तता मानदंड: बेसल मानदंडों के अनुसार 8% CAR (Capital Adequacy Ratio) लागू करने की सिफारिश
- शाखा लाइसेंसिंग नीति समाप्त: बैंकों को अपनी शाखाएँ खोलने की स्वतंत्रता
- निजी क्षेत्र के बैंकों को अनुमति: HDFC बैंक, ICICI बैंक जैसे निजी बैंकों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ
- प्रावधानीकरण (Provisioning) मानदंड: आय मान्यता, परिसंपत्ति वर्गीकरण के लिए सख्त नियम
महत्वपूर्ण परिणाम
- 1994 में रुपया चालू खाते में परिवर्तनीय हुआ
- निजी बैंकों के लाइसेंस जारी किए गए
- RBI ने प्राडेंशियल नॉर्म्स (प्रावधानीकरण, NPA वर्गीकरण) लागू किए
- बैंकिंग क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी
2. नरसिम्हम समिति – II (1998)
पृष्ठभूमि
- गठन वर्ष: 1998
- अध्यक्ष: एम. नरसिम्हम (पुनः)
- अन्य नाम: Committee on Banking Sector Reforms
- उद्देश्य: प्रथम समिति की सिफारिशों के कार्यान्वयन की समीक्षा और आगे के सुधारों के लिए सुझाव
प्रमुख सिफारिशें
- बैंकों का विलय (Merger): बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) के विलय की सिफारिश ताकि वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें
- नैरो बैंकिंग (Narrow Banking): कमजोर बैंकों को अपने धन को अल्पकालिक जोखिम-मुक्त परिसंपत्तियों में निवेश करने की अनुमति
- NPA प्रबंधन: 2002 तक NPA को 3% तक कम करने का लक्ष्य; एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों (ARCs) के गठन की सिफारिश
- पूंजी पर्याप्तता मानदंड बढ़ाना: न्यूनतम CAR को 8% से बढ़ाकर 10% करने का सुझाव
- सरकारी स्वामित्व में कमी: सरकार का बैंकों में हिस्सा 50% से कम करने की सिफारिश; बैंकों को RBI के एकमात्र नियामक के अधीन लाने का सुझाव
- विदेशी बैंकों के लिए प्रवेश मानदंड सख्त: न्यूनतम स्टार्ट-अप पूंजी USD 10 मिलियन से बढ़ाकर USD 25 मिलियन करना
- कानूनी सुधार: प्राथमिक बैंकिंग कानूनों (Banking Regulation Act, RBI Act) का आधुनिकीकरण
- कार्यात्मक स्वायत्तता: बैंकों को ऋण की मात्रा और शर्तें तय करने में अधिक लचीलापन
महत्वपूर्ण परिणाम
- 2000 के दशक में कई बैंक विलय हुए
- SARFAESI Act, 2002 लागू किया गया (एसेट रिकंस्ट्रक्शन के लिए)
- RBI की भूमिका में बदलाव – अधिक नियामक और पर्यवेक्षी भूमिका
3. नचिकेत मोर समिति (2013)
पृष्ठभूमि
- गठन वर्ष: 2013
- अध्यक्ष: डॉ. नचिकेत मोर (Nachiket Mor), तत्कालीन RBI सेंट्रल बोर्ड सदस्य
- अन्य नाम: Committee on Comprehensive Financial Services for Small Businesses and Low-Income Households
- उद्देश्य: वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देना
प्रमुख सिफारिशें
- हर नागरिक के लिए इलेक्ट्रॉनिक बैंक खाता: 1 जनवरी 2016 तक प्रत्येक व्यक्ति (18+ आयु) के पास इलेक्ट्रॉनिक बैंक खाता होना चाहिए (आधार के साथ लिंक)
- पेमेंट्स बैंक (Payments Banks) की स्थापना: छोटे बचत खाते और भुगतान सेवाएँ देने वाले विशेष बैंक
- NBFCs और बैंकों के लिए समान नियम (Convergence): NPA वर्गीकरण और प्रावधानीकरण मानदंड बैंकों और NBFCs के लिए समान होने चाहिए (90 दिन के बाद NPA)
- SARFAESI Act का विस्तार: NBFCs को भी 'सिक्योर्ड क्रेडिटर' का दर्जा देकर DRT का दरवाजा खोला जाए
- प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) का विस्तार: छोटे व्यवसायों और कम आय वाले परिवारों को ऋण पहुँचाने पर जोर
- NBFCs का पुनर्वर्गीकरण: दो श्रेणियाँ – CICs (Core Investment Companies) और अन्य सभी NBFCs
महत्वपूर्ण परिणाम
- पेमेंट्स बैंक (जैसे पेटीएम, एयरटेल) का लाइसेंस जारी हुआ
- स्मॉल फाइनेंस बैंक की अवधारणा को बढ़ावा मिला
- वित्तीय समावेशन को गति मिली
4. पी. जे. नायक समिति (2014)
पृष्ठभूमि
- गठन वर्ष: 2014
- अध्यक्ष: पी. जे. नायक (P. J. Nayak), पूर्व चेयरमैन, एक्सिस बैंक
- अन्य नाम: Committee on Governance of Bank Boards
- उद्देश्य: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड के शासन (Governance) की समीक्षा
प्रमुख सिफारिशें
- सरकारी स्वामित्व 50% से कम करना: सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी 50% से कम की जाए (प्रभावी रूप से निजीकरण)
- बैंक निवेश कंपनी (BIC) का गठन: सरकारी शेयरों को एक पैसिव इन्वेस्टमेंट कंपनी (BIC) में स्थानांतरित किया जाए
- दोहरे नियामक से मुक्ति: बैंकों को वित्त मंत्रालय के दखल से मुक्त कर केवल RBI के अधीन लाया जाए
- स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति: सरकारी नामांकित निदेशकों की जगह वास्तव में स्वतंत्र निदेशक (Independent Directors) हों
- पुराने निजी बैंकों की श्रेणी का युक्तिकरण
विवाद
- बैंक कर्मचारी संघों ने व्यापक विरोध किया, हड़ताल की चेतावनी दी
- CPI जैसे राजनीतिक दलों ने इसे प्रतिगामी (retrograde) बताया
- सरकार ने इन सिफारिशों को पूरी तरह लागू नहीं किया
5. इनक्वायरी कमेटी (2015) – यूनिवर्सल बैंक लाइसेंस
पृष्ठभूमि
- गठन वर्ष: 2015
- उद्देश्य: नए यूनिवर्सल बैंकों के लाइसेंस के मानदंडों की समीक्षा
प्रमुख सिफारिशें
- न्यूनतम पूंजी आवश्यकता बढ़ाना: यूनिवर्सल बैंकों के लिए ₹500 करोड़ से बढ़ाकर ₹1000 करोड़
- स्मॉल फाइनेंस बैंकों के लिए: न्यूनतम पूंजी ₹200 करोड़ से बढ़ाकर ₹300 करोड़
- NOFHC (Non-operative Financial Holding Company) ढाँचा: नए बैंक लाइसेंस के लिए यही पसंदीदा ढाँचा बना रहेगा
- लिस्टिंग की समयसीमा: स्मॉल फाइनेंस बैंक और पेमेंट्स बैंक को परिचालन शुरू होने के 10 वर्षों के भीतर या ₹1000 करोड़ की नेट वर्थ तक पहुँचने के 6 वर्षों के भीतर लिस्ट होना होगा
6. हाई-लेवल कमेटी ऑन बैंकिंग (2026) – विकसित भारत 2047 विजन
पृष्ठभूमि
- गठन वर्ष: 2026
- उद्देश्य: भारत के बैंकिंग क्षेत्र की समीक्षा और विकसित भारत 2047 विजन के लिए सुधारों की सिफारिश
प्रस्तावित दिशा
- संरचनात्मक दक्षता (Structural Efficiency) में सुधार
- जोखिम प्रबंधन ढाँचे को मजबूत करना
- प्रौद्योगिकी और डेटा एनालिटिक्स का एकीकरण
- ग्राहक संरक्षण (Customer Protection) को बढ़ावा देना
- रणनीतिक क्षेत्रों में ऋण पहुँच बढ़ाना
📊 सारांश तालिका (UGC NET के लिए)
| समिति | वर्ष | अध्यक्ष | मुख्य फोकस | प्रमुख सिफारिशें |
|---|---|---|---|---|
| नरसिम्हम I | 1991 | एम. नरसिम्हम | वित्तीय क्षेत्र सुधार | SLR/CRR कमी, निजी बैंकों को अनुमति, CAR 8% |
| नरसिम्हम II | 1998 | एम. नरसिम्हम | बैंकिंग सुधार (द्वितीय चरण) | NPA प्रबंधन, बैंक विलय, नैरो बैंकिंग, CAR 10% |
| नचिकेत मोर | 2013 | डॉ. नचिकेत मोर | वित्तीय समावेशन | पेमेंट्स बैंक, हर व्यक्ति को बैंक खाता, NBFC vs Bank समान नियम |
| पी. जे. नायक | 2014 | पी. जे. नायक | बैंक बोर्ड गवर्नेंस | सरकारी हिस्सेदारी <50%, BIC, RBI का एकल नियमन |
| इनक्वायरी | 2015 | — | यूनिवर्सल बैंक लाइसेंस | न्यूनतम पूँजी ₹1000 करोड़ (यूनिवर्सल) |
| हाई-लेवल | 2026 | — | विकसित भारत 2047 | संरचनात्मक दक्षता, जोखिम प्रबंधन, प्रौद्योगिकी एकीकरण |
🧠 परीक्षा के लिए ट्रिक्स (Tricks to Remember)
Concept Trick
नरसिम्हम I (1991) → "1991 – SLR/CRR घटे, निजी बैंक बढ़े, CAR 8% का नियम बने"
नरसिम्हम II (1998) → "1998 – NPA घटाने की ठानी, विलय से बैंकों की शक्ति बढ़ानी"
नचिकेत मोर (2013) → "2013 – Financial Inclusion का डंका, Payments Bank और NBFC-Bank समानता का झंडा"
पी. जे. नायक (2014) → "2014 – Nayak ने PSB की सरकारी हिस्सेदारी घटाने का रखा तर्क, विवादों में आया यह वर्क"
अंतिम ट्रिक: "नरसिम्हम I ने बैंकिंग को उदार बनाया, नरसिम्हम II ने सख्त नियम अपनाया; नचिकेत मोर ने सबको बैंक से जोड़ा, नायक ने सरकारी हिस्सा कम करने का सूत्र तोड़ा" 😊
💡 UGC NET सन्दर्भ: उपर्युक्त सभी समितियाँ बैंकिंग सुधारों के प्रमुख मील के पत्थर हैं। परीक्षा में नरसिम्हम I और II, नचिकेत मोर तथा नायक समिति से अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।
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