बेसल (BASEL) – अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नियमों की पूरी गाइड
🏦 बेसल (BASEL) – अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नियमों की पूरी गाइड
बेसल (BASEL) शब्द अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग नियमों से जुड़ा है। इसका पूरा नाम Basel Accords है, जिसे Bank for International Settlements (BIS) के तहत स्थित Basel Committee on Banking Supervision (BCBS) ने बनाया है।
1. बेसल समिति (Basel Committee on Banking Supervision - BCBS)
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| स्थापना वर्ष | 1974 (ब्रेटन वुड्स प्रणाली के पतन के बाद) |
| मुख्यालय (Secretariat) | बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS), बेसल, स्विट्जरलैंड |
| उद्देश्य | बैंकिंग पर्यवेक्षण (Banking Supervision) के मानक विकसित करना और दुनिया भर में उनके कार्यान्वयन को बढ़ावा देना |
| सदस्यता | 28 देशों (भारत सहित) के केंद्रीय बैंक और बैंकिंग नियामक सदस्य हैं |
✅ सरल शब्दों में: यह वह समिति है जो दुनिया के बैंकों के लिए सुरक्षा नियम बनाती है, ताकि 2008 जैसा वित्तीय संकट फिर से न आए।
2. तीन मुख्य बेसल स्तंभ (Three Pillars of Basel Accords)
Minimum Capital Requirements
बैंक को अपने जोखिम (Risk) के हिसाब से कितनी पूंजी (Capital) रखनी चाहिए।
Supervisory Review Process
नियामक (RBI) यह जांच करते हैं कि बैंक सही तरीके से जोखिम माप रहा है या नहीं।
Market Discipline
बैंक को अपने वित्तीय स्वास्थ्य की जानकारी सार्वजनिक रूप से बतानी होगी, ताकि ग्राहक और निवेशक सही निर्णय ले सकें।
3. बेसल का क्रमिक इतिहास (Basel I → II → III → IV)
📌 Basel I (1988) – शुरुआत
| प्रकाशन वर्ष | 1988 (भारत में 1992 में लागू) |
|---|---|
| मुख्य फोकस | क्रेडिट जोखिम (Credit Risk – लोन डूबने का जोखिम) |
| मुख्य नियम | बैंकों को अपने जोखिम भरे एसेट्स (RWA) का कम से कम 8% पूंजी (Capital) रखनी होगी। |
उदाहरण: ₹100 करोड़ लोन → कम से कम ₹8 करोड़ अपनी पूंजी रखनी होगी।
🔑 Trick: “Basel I ने 8% का नियम दिया, 1988 में बैंकों को सुरक्षा का रास्ता दिखाया”
📌 Basel II (2004) – विस्तार
| प्रकाशन वर्ष | 2004 (भारत में 2009 से लागू) |
|---|---|
| मुख्य फोकस | 3 स्तंभ (Pillars) की शुरुआत, ऑपरेशनल जोखिम (Operational Risk) को शामिल किया (हैक, धोखाधड़ी, आंतरिक गलतियाँ) |
🔁 Basel I और II में अंतर: Basel I सिर्फ क्रेडिट जोखिम, Basel II ने ऑपरेशनल + मार्केट जोखिम जोड़ा।
🧠 Trick: “Basel II ने तीन स्तंभ बनाए, ऑपरेशनल रिस्क को भी अपनाया”
📌 Basel III (2010-11) – 2008 के संकट के बाद सख्त नियम
| प्रकाशन वर्ष | 2010-11 (2008 वैश्विक वित्तीय संकट के बाद) |
|---|---|
| भारत में लागू | चरणबद्ध तरीके से 2023-24 तक (RBI दिशानिर्देश) |
| नए नियम | CET1, CCB (2.5%), CCyB (0-2.5%), LCR (30 दिन नकदी), NSFR (लंबी अवधि स्थिर फंडिंग) |
Basel III में CAR (Capital Adequacy Ratio):
| पूंजी का प्रकार | न्यूनतम अनुपात |
|---|---|
| CET1 (कोर पूंजी) | 5.5% |
| Tier 1 पूंजी (CET1 + AT1) | 7% |
| कुल पूंजी (Tier1 + Tier2) | 9% |
| पूंजी संरक्षण बफर (CCB) | +2.5% |
| कुल (न्यूनतम + CCB) | 11.5% |
🇮🇳 भारत में वर्तमान CAR (2025): भारतीय बैंकों का औसत CRAR 15-17% के आसपास (Basel III से कहीं अधिक)।
🧠 Trick: “Basel III ने बफर (Buffer) बनाया, 11.5% का नियम लागू किया”
📌 Basel IV (2017) – टेक्निकल सुधार (अनौपचारिक नाम)
अधिकारिक नाम: Basel III: Final Reforms या Basel 3.5
प्रकाशन वर्ष: 2017 | भारत में लागू: 1 अप्रैल 2027 से
| परिवर्तन | सरल भाषा |
|---|---|
| आउटपुट फ्लोर (Output Floor) | बैंकों की गणना से निकलने वाले RWA को 72.5% से कम नहीं होने देंगे (बैंक कम जोखिम नहीं दिखा सकते) |
| ऑपरेशनल रिस्क का नया फॉर्मूला | पुराने जटिल मॉडल हटाकर स्टैंडर्ड फॉर्मूला लागू |
| सीमा पार (Cross-border) एक्सपोजर | विदेशी लेनदेन पर नियम सख्त |
| ईसीएल (Expected Credit Loss) फ्रेमवर्क | लोन डूबने से पहले ही अनुमान लगाकर प्रावधान (भारत में अप्रैल 2027 से) |
🧠 Trick: “Basel IV ने Output Floor बनाया, Bank की Risk Calculation को पारदर्शी बनाया”
📊 एक नज़र में बेसल का इतिहास (UGC NET के लिए सुपर टेबल)
| बेसल | वर्ष | मुख्य फोकस | मुख्य नियम / बदलाव |
|---|---|---|---|
| Basel I | 1988 | क्रेडिट रिस्क (Loan default) | CAR ≥ 8% |
| Basel II | 2004 | क्रेडिट + ऑपरेशनल + मार्केट रिस्क | तीन स्तंभ (Pillars) |
| Basel III | 2010-11 | 2008 संकट के बाद सख्ती | CET1 (5.5%), CCB (2.5%), LCR, NSFR |
| Basel IV (Final Reforms) | 2017 | टेक्निकल सुधार | Output Floor (72.5%), नया ऑपरेशनल रिस्क |
4. 🇮🇳 भारत में बेसल मानदंड
- RBI ने बेसल I, II, III को समय-समय पर अपनाया है।
- भारत ने Basel IV (Final Reforms) को लागू करने की अंतिम तिथि 1 अप्रैल 2027 रखी है।
- RBI अक्सर बेसल से अधिक सख्त मानदंड रखता है (भारत में CAR 9% के बजाय 11-15% देखा जाता है)।
🧠 UGC NET परीक्षा के लिए ट्रिक्स (Tricks Table)
| Concept | Trick / याद रखने का तरीका |
|---|---|
| Pillar 1 | "Pillar 1 = पूंजी (Capital)" |
| Pillar 2 | "Pillar 2 = पुलिस (RBI की जांच)" |
| Pillar 3 | "Pillar 3 = प्रचार (बैंकों को खुला रहना होगा)" |
| CAR Formula | "CAR = Capital / RWA × 100" |
| LCR (Liquidity Coverage Ratio) | "LCR = आपातकाल (30 दिन) के लिए तरल संपत्ति / कुल नकदी बहिर्वाह" |
| NSFR | "NSFR = साल भर के लिए स्थिर फंडिंग का अनुपात" |
| CET1 | "CET1 = मालिकों का सबसे साफ पैसा (Share Capital + Reserves)" |
| AT1 (Additional Tier 1) | "AT1 = Perpetual Bonds, जिन्हें ब्याज देना अनिवार्य नहीं" |
| CCB (Capital Conservation Buffer) | "CCB = मुश्किल समय के लिए अतिरिक्त पूंजी (2.5%)" |
| CCyB (Countercyclical Buffer) | "CCyB = ग्रोथ के मौसम में बचत" |
"Basel I (1988) ने 8% से शुरुआत की, Basel II (2004) ने ऑपरेशनल रिस्क को जगह दी, Basel III (2010) ने बफर और लिक्विडिटी नियम बनाए, और Basel IV (2017) ने आउटपुट फ्लोर से पूरा खेल सख्त बनाया" 😊
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